॥संध्योपासना॥
संध्योपासनाका अर्थ अहोरात्रस्य यः सन्धिः सूर्यनक्षत्रवर्जितः। सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः॥ (दक्षस्मृति) सूर्य और नक्षत्रोंसे रहित जो दिन और रातकी संधिका समय है उसे तत्वदर्शी मुनीयोंने संध्या कहा है। व्यासस्मृति मे कहा गया है संध्येति सूर्यगं ब्रह्म सूर्यमंडलगत ब्रह्म ही संध्या है अतः सूर्यस्वरूप ब्रह्मकी उपासना ही संध्या है। पुर्वां संध्यां सनक्षत्रामुपक्रम्य यथाविधि। गायत्रीमभ्यसेतावद् यावदादित्यदर्शनम् ॥ मतलब आचमनसे लेकर गायत्री जप पर्यंत सभी कर्म संध्योपासना ही है। संध्योपासना कब करनी चाहिए अहरहः संध्यामुपासीत (तैतरीय) इससे ज्ञात होता है की प्रतिदिन संध्योंपासना करनी चाहिए प्रातः संध्या उत्तमा तरकोपेता मध्यमा लुप्ततारका। अधमा सूर्यसहिता प्रातः संध्या त्रिधा स्मृता॥ जब आकाश मे तारे दिखते हो वह उत्तम संध्या है। तारे लुप्त होने के बाद मध्यम सूर्योदय के बाद का समय अधम माना गया है और सायं संध्या के लिए कहा गया है। उत्तमा सूर्यसहीता मध्यमा लुप्तभास्करा। अधमा तारकोपेता सायंसंध्या त्रिधा स्मृता॥ सायं संध्या सूर्यास्तसे पहेले करनी चाह...